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कबीर के दोहे कविता Class 8 Summary in Hindi
कबीर के दोहे Class 8 Hindi Summary
कबीर के दोहे कविता का सारांश – कबीर के दोहे Class 8 Summary in Hindi
संत कबीरदास जी किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे हिंदी साहित्य के महान भक्त कवि और समाज सुधारक थे। कबीरदास जी भक्तिकाल के सबसे प्रसिद्ध कवि तथा विचारक माने जाते हैं। इनकी वाणी में अमृत तथा दोहे गागर में सागर के समान हैं। अपने दोहों के माध्यम से उन्होंने समाज की कुरीतियों पर प्रहार करने का कार्य सिद्ध किया है। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से समाज में फैले पाखंड, कुरीतियों, अज्ञानता, अंधविश्वास की निंदा और धार्मिक आडंबरो को दूर करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत दोहों में नैतिकता, जीवन की सच्चाई और सामाजिक बुराईयों पर प्रहार किया गया है।
कबीरदास जी पहले दोहे में कहते हैं कि सच्चाई किसी भी तपस्या से बढ़कर है और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं है। जो लोग सत्य बोलते हैं उनके हृदय में ईश्वर का वास होता है। वे सत्य बोलने पर बल देते हैं।
इसी प्रकार दूसरे दोहे में कबीरदास जी विनम्र एवं परोपकारी बनने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं कि खजूर का पेड़ लंबा और बहुत ऊँचा होता है। न तो उसकी छाया राहगीरों को मिलती है न ही फल। ऐसे ही इंसान भी बड़ा कहलाने से बड़ा नहीं होता। दूसरों के लिए उपयोगी होने पर ही वह महान बन सकता है। हमें दूसरों की सदैव सहायता करनी चाहिए। मानव को परोपकारी एवं विनम्र होना चाहिए।
कबीरदास जी गुरु को श्रेष्ठ मानते हैं तथा तीसरे दोहे में गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान (गोविंद) दोनों एक साथ खड़े हों, तो पहले किसके पैर छूने चाहिए? वे दोनों में से गुरु को श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि गुरु ही हैं जो भगवान तक पहुँचने का मार्ग हमें दिखाते हैं। वे (गुरु) भगवान से ऊपर हैं। आगे कबीरदास जी कहते हैं कि जीवन में संतुलन बेहद महत्त्वपूर्ण होता है। वे कहते हैं कि ज्यादा बोलना अच्छा नहीं है और न ही ज्यादा चुप रहना अच्छा है।
जैसे न तो अधिक बारिश अच्छी होती है न ही ज्यादा धूप। वे बताना चाहते हैं कि जीवन में संतुलन कितना अनिवार्य होता है। कबीर जी ने मीठी वाणी के गुणों का भी बखूबी वर्णन किया है। वे कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को अच्छी लगे । जिससे आपका अहंकार मिट जाए। आपको ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिसे सुनकर सुनने वाले का मन प्रसन्न हो जाए तथा बोलने वाला भी आनंद का अनुभव कर पाएँ ।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि निंदा करने वाले (निंदक) को अपने पास आंगन में कुटिया बना कर रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के ही आपके स्वभाव को निर्मल कर देता है। इससे हमें सीखना चाहिए कि आलोचना को हमें सकारात्मक रूप में लेना चाहिए तथा उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए। संत कबीर सार्थक बातों को ग्रहण करने की शिक्षा देते हुए कहते हैं कि एक सज्जन व्यक्ति को सूप की तरह होना चाहिए।
जिस तरह सूप अनाज के अच्छे दानों को अपने पास रख लेता है और बेकार छिलकों इत्यादि अवगुणों को उड़ा देता है ठीक उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति को भी अच्छे गुणों एवं सार्थक बातों को अपनाना चाहिए तथा व्यर्थ की बातों तथा अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। कबीर जी अंतिम दोहे में मन और संगति के बारे में समझाते हुए कहते हैं कि मानव का मन एक पंछी की तरह है जो जहाँ मन करता है, उड़कर वहीं चला जाता है। इसी प्रकार मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
संत कबीर की भाषा एवं विचारधारा कबीर जी की वाणी में अमृत हैं। कबीरदास जी की मुख्य भाषा पंचमेल खिचड़ी है जिसकी वजह से सभी लोग कबीर जी के दोहों को आसानी से समझ पाते हैं। इनके दोहों के गूढ़ अर्थ को समझकर यदि कोई उन्हें अपने जीवन में उतारता है तो उसे निश्चय ही मन की शांति और ईश्वर प्राप्ति हो जाती है। इनके दोहे बहुत सरल हैं। यह आसानी से आम लोगों को भी समझ में आ जाते हैं। संत कबीरदास जी हिंदी साहित्य के महान भक्त कवि और
समाज सुधारक थे। कबीर जी ने अपने समय में व्याप्त सामाजिक बुराइयों पर लगातार कुठाराघात किया। उनका एक-एक दोहा सारगर्भित संदेश और अमूल्य शिक्षा से भरा हुआ है। उन्होंने ताउम्र पाखंड, अंधविश्वास एवं अज्ञानता जैसी कुरीतियों पर चोट करते हुए लोगों को सदैव सत्य एवं सदाचार पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दी है। प्राणिमात्र से प्रेम का संदेश, उनके हृदय में सच की ज्योति प्रज्वलित करना और लोगों को आडंबरों से दूर रखना ही कबीर के चिंतन की मूल अवधारणा रही हैं।
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कबीर के दोहे कविता कीव परिचय

एक ऐसे संत जो करघे पर कपड़ा और मन में कविता बुनते-बुनते इतने प्रसिद्ध हो गए कि उनकी कविताएँ आज भी लोग भजनों की तरह सुनते हैं और पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाते हैं। माना जाता है कि कबीर का जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी में हुआ था। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं। आज भी उनकी रचनाएँ हमें जीवन की सच्चाई को समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देती हैं।
कबीर के दोहे कविता हिंदी भावार्थ Pdf Class 8
1. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप ||(पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
साँच – सच या सत्य।
तप – तपस्या।
झूठ – असत्य ।
जाके – जिसके ।
जाके – उसके ।
हिरदे – हृदय में।
गुरु – ईश्वर ।
भावार्थ-
कबीर जी कहते हैं कि सच्चाई के बराबर कोई तपस्या नहीं है, झूठ (मिथ्या आचरण) के बराबर कोई पाप कर्म नहीं है। जिसके हृदय (मन) में सच्चाई है उसी के हृदय में ईश्वर निवास करते हैं।
कबीर जी इस दोहे के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि इस संसार में सत्य के मार्ग पर चलने से बड़ी कोई साधना या तप नहीं है। यदि आप सत्य का पालन करते हैं तो आपको किसी और तपस्या की कोई आवश्यकता नहीं है। किंतु यदि आप झूठ बोलते हैं तो आप पाप के भागीदार बनते हैं क्योंकि झूठ से बड़ा कोई पाप कर्म नहीं है। जिस भी व्यक्ति के हृदय में सच्चाई है, उसके मन में सदैव ईश्वर वास करते हैं।
2. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर || (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
पंथी – राहगीर, राही ।
छाया – छाँव ।
लागै – लगना ।
भावार्थ-
इसमें संत कबीरदास जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ बेशक बहुत बड़ा होता है लेकिन वो न तो किसी को छाया प्रदान कर पाता है और न ही फल। खजूर के फल बहुत ऊँचाई पर लगते हैं इसलिए राहगीर इनका आनंद भी नहीं उठा पाते।
इस दोहे के माध्यम से कबीर जी यह संदेश देना चाहते हैं कि बड़प्पन दूसरों के लिए उपयोगी होने में है न कि केवल शक्तिशाली या बड़ा होने में।
कबीर जी ने खजूर के पेड़ के माध्यम से बड़े लोगों के किया है। उनका मानना है कि यदि कबीर जी ने खजूर अहंकार पर भी व्यंग्य आप बड़े बन भी गए हैं किंतु आपका बड़प्पन किसी के काम नहीं आया तो आपका बड़प्पन व्यर्थ है। यदि समाज में आप अपने पद के कारण ऊँचे हैं लेकिन दूसरों की मदद करने के काबिल नहीं हैं तो आपका ऊँचा (बड़ा) होना व्यर्थ है। बड़ा वही है जो दूसरों के काम आ सके तथा उसी में अपने जीवन को धन्य मानता है।
3. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
गुरु – वह जो ज्ञान दें / शिक्षक ।
गोविंद – ईश्वर ।
बलिहारी – प्रेम या भक्ति के कारण न्योछावर हो जाना ।
भावार्थ –
कवि कहते हैं कि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों ही मेरे सम्मुख (सामने) खड़े हैं तो ऐसी स्थिति में मुझे किसे पहले प्रणाम करना चाहिए – गुरु को या गोविंद (भगवान) को ? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में पहले शीश झुकाना उत्तम है क्योंकि मेरे गुरु ने ही मुझे गोविंद अर्थात् भगवान से मिलाया है। गुरु ने ही मुझे ईश्वर तक पहुँचने का ज्ञान प्रदान किया है।
इस दोहे में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है। अगर गुरु-प्राप्ति हो जाए तो ईश्वर-प्राप्ति सरल हो जाती है।
4. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप ।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
अति – बहुत ज्यादा।
चूप – चुप रहना।
भावार्थ-
कबीरदास जी कहते हैं कि इंसान को न तो बहुत अधिक बोलना चाहिए और न ही पूरी तरह से चुप रहना चाहिए। जैसे न तो ज्यादा बारिश अच्छी होती है और न ही ज्यादा धूप।
कवि का मानना है कि लगातार बोलने से बातों का असर कम हो जाता है और बहुत ज्यादा बोलना व्यक्ति को नकारात्मक बना सकता है। इसी प्रकार अधिक चुप रहना भी सही नहीं है इससे लोगों के साथ संवाद और समझ का अभाव हो सकता है। कबीर जी ने इस विचार को प्राकृतिक उदाहरणों के साथ समझाया है। वे कहते हैं जैसे बहुत ज्यादा बारिश से फसलें नष्ट हो जाती हैं ठीक वैसे ही अत्यधिक धूप भी फसलों के लिए नुकसानदायक होती है । इस दोहे में संतुलन की महत्ता पर जोर दिया गया है।
5. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
बानी – मानव मुख से निकलने वाले शब्द/ भाषा ।
औरन – दूसरों को ।
सीतल – शीतल, ठंडक एवं सुख पहुँचाने वाले ।
भावार्थ –
इस दोहे में संत कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी भाषा (वाणी) बोलनी चाहिए जिसे सुन कर सामने वाले व्यक्ति को अच्छा लगे और शांति मिले। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ बोलने वाले को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।
इसमें कवि ने मधुर वाणी के महत्त्व को दर्शाया है। उनका कहना है कि हमें ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो दूसरों के दिल को छू सके और उन्हें प्रसन्नता प्रदान करे। जब हम मीठी वाणी विनम्रता के साथ बोलते हैं तो हम न केवल सामने वाले का दिल जीत लेते हैं बल्कि स्वयं भी संतोष और आनंद का अनुभव करते हैं।
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6. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छंवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
निंदक – दूसरों की बुराइयाँ करने वाले ।
नियरे – पास ।
निर्मल – साफ़।
सुभाय – स्वभाव।
भावार्थ-
कबीरदास जी कहते हैं कि निंदा अर्थात आलोचना करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास रखना चाहिए। जिस प्रकार साबुन और पानी से नहाकर हमारा शरीर स्वच्छ होता है उसी प्रकार ऐसे व्यक्ति हमें हमारी कमियाँ बताकर हमारा स्वभाव निर्मल करवा देते हैं। अपनी बुराईयाँ जानकर हम अपनी गलतियाँ सुधार सकते हैं। निंदक लोग इंसान का स्वभाव शीतल बना देते हैं।
कबीर जी इस दोहे में कहते हैं कि आलोचक हमारी कमियों को सामने लाकर हमें सुधारने में मदद करते हैं। इसलिए निंदक को दूर भगाने की बजाय उसे अपने पास रखने में ही लाभ है, क्योंकि वह हमें लगातार सुधारने और निखारने का काम करता है।
7. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
साधू – संत / सज्जन ।
सूप – अनाज साफ करने वाला उपकरण ।
सार – निचोड़ ।
गहि – ग्रहण करना ।
थोथा – बुराई, अवगुण ।
भावार्थ –
इस दोहे में कबीरदास जी ने एक आदर्श साधु या सज्जन व्यक्ति का गुण बताते हुए उसे ‘सूप’ के समान विशेषता वाला कहा है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार सूप अनाज को झटक कर केवल उपयोगी अनाज को अपने पास रखता है और भूसी (गंदगी) आदि उड़ा देता है। कबीर जी कहते हैं कि ठीक इसी तरह से सज्जन और साधु को भी होना चाहिए। उसे जीवन में सार्थक और बहुमूल्य चीजों को अपनाना चाहिए और जो व्यर्थ या नकारात्मक है उसे छोड़ देना चाहिए।
कबीर जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति को सद्गुणों को अपनाकर अवगुणों और बुरी आदतों को छोड़ देना चाहिए।
8. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय ।। (पृष्ठ 63)
शब्दार्थ :
पंछी – पक्षी ।
तहवाँ – वहाँ ।
जाय – जाना।
भावार्थ –
इस दोहे में कवि कहते हैं कि मन एक पक्षी की तरह है, जहाँ उसे अच्छा लगता है, वह वहीं चला जाता है, अर्थात् मन बहुत ही चंचल है। यह जहाँ आकर्षित होता है उसी ओर चला जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि हमारी संगति हमारे जीवन पर बहुत असर डालती है। यदि हम बुरी संगति में रहेंगे तो हमारा मन भी बुराई की तरफ भागेगा और उसका फल भी बुरा ही मिलेगा। इसलिए हमें हमेशा अच्छी संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए ताकि हमारा मन सत्कर्मों की तरफ प्रेरित हो ।
Class 8 Hindi Chapter 5 Summary कबीर के दोहे
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ।।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोया ।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय ॥
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ॥
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
– कबीर
*संदर्भ — कबीर वचनावली, संपादक – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’