Teachers often provide Class 8 Hindi Notes Malhar Chapter 10 तरुण के स्वप्न Summary in Hindi Explanation to simplify complex chapters.
तरुण के स्वप्न Class 8 Summary in Hindi
तरुण के स्वप्न Class 8 Hindi Summary
तरुण के स्वप्न का सारांश – तरुण के स्वप्न Class 8 Summary in Hindi
नेताजी सुभाषचंद्र बोस महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को साहस, संकल्प और देशभक्ति के मूल्यों को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रेरित किया। नेताजी ने अपने हृदय की गहराइयों से राष्ट्र की स्वतंत्रता और संपन्न समाज के सपने देखे थे।
सच्चे देशभक्त सुभाषचंद्र बोस का जीवन लक्ष्य था, भारत से अंग्रेजों को निकाल बाहर करना तथा देशवासियों को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करना। उन्होंने युवकों को संगठित रहने की प्रेरणा दी।
विभिन्न अवसरों पर अपने ओजस्वी भाषणों के द्वारा संघर्ष करने और स्वाधीन राष्ट्र प्राप्त करने का आह्वान किया। इस पाठ के द्वारा हम यहाँ जानेंगे कि 29 दिसंबर, 1929 में मेदिनीपुर (बंगाल) जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए स्वतंत्र भारत और समान अधिकार के लिए नेताजी ने युवाओं को उठने और आगे बढ़ने के लिए कहा।
उन्होंने देश के युवाओं से सही आदर्श चुनकर उसे साकार करने को कहा । स्वतंत्र भारत में सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बंधनों से प्रत्येक व्यक्ति की मुक्ति की कामना की। अपने उद्बोधन में नेताजी ने नारी सशक्तिकरण और जातिगत भेद-भाव से ऊपर उठने का संदेश दिया।
तरुण के स्वप्न पाठ लेखक परिचय

उड़ीसा (अब ओड़िशा) राज्य के कटक नगर में जन्मे सुभाषचंद्र बोस को ‘नेताजी’ के नाम से जानता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका उद्देश्य स्पष्ट था- भारत को अँग्रेजी शासन से मुक्त कराना। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनकी दूरदर्शिता का पता तब चलता है जब उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व संभाला।
सन् 1857 में भारतीय सैनिकों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जिस तरह एकजुट होकर युद्ध किया, उसके बाद सुभाषचंद्र बोस ही ऐसे महान सेनानी हुए जिन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ के माध्यम से एकजुट होकर अंग्रेजों को चुनौती दी।
उन्होंने सैनिकों को ‘दिल्ली चलो’ और ‘जय हिंद’ का नारा दिया। सुभाषचंद्र बोस ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए क्रांति का ऐसा बिगुल बजाया कि पूरा देश ‘जय हिंद’ के नारों से गूँज उठा। उन्होंने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ जैसा प्रेरक नारा भी दिया। सुभाषचंद्र बोस ने एक स्वाधीन राष्ट्र और आत्मनिर्भर समाज का सपना देखा।
उनके जीवन के विषय में जानना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानना है। द इंडियन स्ट्रगल उनकी चर्चित पुस्तक है। प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस का वाङ्मय (संपूर्ण लेखन) प्रकाशित किया है। इस प्रकाशन में उनके उपलब्ध सभी कार्यों, पत्रों, टिप्पणियों, भाषणों आदि को सम्मिलित किया गया है।
तरुण के स्वप्न शब्दार्थ
पृष्ठ 140
स्वप्न – सपना ।
देशबंधु चित्तरंजन दास – सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, कवि, पत्रकार व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता ।
उत्स – स्रोत ।
आदर्श – सिद्धांत और नैतिक मूल्य |
सर्वांगीण – संपूर्ण, किसी व्यक्ति या स्थिति के हर पहलू से जुड़ा हुआ।
स्वाधीन – स्वतंत्र
संपन्न – खुशहाल ।
उपभोग – उपयोग करना ।
अर्थ – वित्त ।
विषमता – असमानता।
श्रम – मेहनत ।
अकर्मण्य – कार्य न करने वाला, जो किसी काम का या उपयोग का ना हो।
पृष्ठ 141
विजातीय- दूसरी जाति का, विभिन्न प्रकार का ।
स्वदेशी – अपने देश का ।
यंत्र – युक्ति जो ऊर्जा लेकर कार्य करती है, उपकरण।
सर्वोपरि – सबसे ऊपर या बढ़कर ।
अभाव – न होना, कमी।
सार्थक – अर्थवान ।
समक्ष – सामने ।
नित्य – हर समय, हमेशा, निरंतर ।
अखंड – संपूर्ण, संयुक्त, अविभक्त ।
प्रतिष्ठा – स्थापना, मान-मर्यादा ।
तरुण – नवयुवक, युवा ।
असीम – अपार, जिसकी सीमा न हो।
आनंद – हर्ष, खुशी, उल्लास।
क्षुद्र -छोटा, निम्न, अल्प।
Class 8 Hindi Chapter 8 Summary तरुण के स्वप्न
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐसे स्वाधीन संपन्न समाज और राष्ट्र का सपना देखते थे जिसमें व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से भागीदार बने। वे अपने उद्बोधनों में नारी मुक्ि और सभी को शिक्षा तथा समान अवसर मिलने की बात भी करते थे। अपना यह स्वप्न वे युवाओं को सौंपना चाहते थे जिससे आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र का रूप साकार हो सके। आइए, अब हम नेताजी के उस उद्बोधन के विषय में जानते हैं जो उन्होंने मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में 29 दिसंबर, 1929 को युवाओं को संबोधित करते हुए प्रगट किया था।
स्वप्न तो अनेकों ने देखा। हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा। उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं। इसलिए हमारा भी अपना एक स्वप्न है, इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं। वह स्वप्न या आदर्श क्या है? हम चाहते हैं, एक नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र। उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।

उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो, उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले, उस समाज में अर्थ की विषमता न हो, उस समाज में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए। जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।

जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा या भारतवासी के आदर्श सार्थक बनाकर ही स्थिर नहीं होगा, बल्कि विश्व मानव के समक्ष आदर्श समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा। मैं ऐसे समाज और ऐसे राष्ट्र का ही स्वप्न देखता रहा हूँ। यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है।
इस सत्य की प्रतिष्ठा के लिए सबकुछ किया जा सकता है, हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है, हर संकट को सहा जा सकता है और इस स्वप्न को सार्थक बनाने के दौरान प्राण देना भी है तो ‘वह मरण है स्वर्ग समान’।
हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है, है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है। यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।
– सुभाषचंद्र बोस